साइबर अपराधियों के निशाने पर मध्यप्रदेश, संसाधनों के अभाव में बेबस पुलिस तंत्र

(डॉ एल एन वैष्णव )
भोपाल। तकनीक ने जहां जीवन को सरल बनाया है, वहीं अपराध की दुनिया को भी नई ताकत दी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक, वॉइस क्लोनिंग और फर्जी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए साइबर अपराध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब ठग दूर देशों में बैठकर भी एक क्लिक में लोगों के बैंक खातों तक पहुंच बना लेते हैं।
मध्यप्रदेश में साइबर अपराध के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, लेकिन उससे निपटने के लिए बुनियादी ढांचा और संसाधन अभी भी अपर्याप्त हैं।
स्मार्टफोन और एआई ने बदला अपराध का तरीका
डिजिटल विस्तार के साथ अपराधियों ने भी अपने तौर-तरीके बदल लिए हैं। अब अपराध भीड़भाड़ वाली जगहों से हटकर मोबाइल स्क्रीन पर सिमट गया है।
प्रदेश में जिन साइबर अपराधों की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, उनमें प्रमुख हैं—
- फर्जी कस्टमर केयर नंबर के जरिए ठगी
- ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर डराकर वसूली
- ऑनलाइन निवेश योजनाओं का झांसा
- सोशल मीडिया अकाउंट हैकिंग
- नौकरी और लोन के नाम पर ठगी
- यूपीआई और क्यूआर कोड फ्रॉड
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इन अपराधों का असर दिखाई दे रहा है।
प्रदेश में एकमात्र साइबर थाना
पूरे मध्यप्रदेश में राजधानी भोपाल में ही एक साइबर थाना संचालित है।
तुलनात्मक रूप से देखें तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में 75 साइबर थाने स्थापित हैं। देशभर में 500 से अधिक साइबर थाने कार्यरत बताए जाते हैं।
मध्यप्रदेश के 50 से अधिक जिलों में समर्पित साइबर थानों की अनुपस्थिति के कारण जांच कार्य प्रभावित होता है। जिलों में मौजूद साइबर सेल स्टाफ और तकनीकी संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।
प्रस्ताव लंबित, बजट स्वीकृति का इंतजार
दो वर्ष पूर्व पुलिस मुख्यालय ने सभी जिलों में एक-एक साइबर थाना खोलने का प्रस्ताव शासन को भेजा था। वर्ष 2026-27 के बजट में इसके लिए प्रावधान की उम्मीद थी, लेकिन अब तक न तो थानों की स्वीकृति मिली है और न ही आवश्यक बल की मंजूरी दी गई है।
इसके चलते कई मामलों में जांच लंबित रहती है और पीड़ितों को राहत मिलने में देरी होती है।
750 करोड़ का प्रोजेक्ट फाइलों में
सूत्रों के अनुसार प्रदेश के साइबर ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए लगभग 750 करोड़ रुपये की एक विस्तृत योजना तैयार की गई थी। इसमें डिजिटल फॉरेंसिक लैब, साइबर इंटेलिजेंस सिस्टम, डेटा एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म, विशेषज्ञों की नियुक्ति और पुलिस प्रशिक्षण जैसे प्रावधान शामिल थे।
हालांकि, यह योजना अभी तक अमल में नहीं आ सकी है।
दुष्प्रचार और भ्रम फैलाना भी बड़ी चुनौती
साइबर अपराध अब केवल आर्थिक ठगी तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दुष्प्रचार और भ्रामक सूचनाएं फैलाना भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।
फर्जी अकाउंट और एडिटेड वीडियो के माध्यम से—
- भ्रामक खबरें प्रसारित की जा रही हैं
- अधूरी जानकारी के आधार पर टिप्पणियां की जा रही हैं
- प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई पर बिना पुष्टि के आरोप लगाए जा रहे हैं
- न्यायिक प्रक्रियाओं पर भी सोशल मीडिया में टिप्पणियां सामने आ रही हैं
विशेषज्ञों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन अपुष्ट और भ्रामक जानकारी सामाजिक अस्थिरता और संस्थाओं के प्रति अविश्वास को बढ़ा सकती है।
जांच में देरी से अपराधियों को लाभ
साइबर अपराधी अक्सर फर्जी सिम, बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट और अंतरराज्यीय नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं। तकनीकी संसाधनों की कमी के कारण जांच में समय लगता है, जिससे अपराधियों को बच निकलने का अवसर मिल जाता है।
जागरूकता ही पहली सुरक्षा
विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल साक्षरता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। यदि स्कूल, कॉलेज और ग्राम स्तर तक साइबर जागरूकता अभियान चलाए जाएं तो कई मामलों में ठगी को रोका जा सकता है।
हाईटेक अपराध से निपटने के लिए ठोस कदम जरूरी
स्थिति को देखते हुए आवश्यकता है कि—
✔ प्रत्येक जिले में साइबर थाना स्थापित हो
✔ तकनीकी रूप से प्रशिक्षित स्टाफ की नियुक्ति हो
✔ डिजिटल फॉरेंसिक सुविधाएं विकसित की जाएं
✔ त्वरित शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत किया जाए
✔ सोशल मीडिया मॉनिटरिंग और तथ्य-जांच प्रणाली प्रभावी बने
समय की मांग
डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ साइबर सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक हो गया है। यदि समय रहते संसाधन और संरचना मजबूत नहीं की गई तो साइबर अपराध और दुष्प्रचार दोनों ही कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।
मध्यप्रदेश के सामने अब यह प्रश्न है कि वह बदलते डिजिटल परिदृश्य के अनुरूप अपने तंत्र को सशक्त बनाए या बढ़ते साइबर खतरे का सामना सीमित संसाधनों के साथ करता रहे।
