2024 में वसूली के आदेश, 2026 में पूरा भुगतान — जांच रिपोर्ट के बाद भी किसने दबाया सच?
(डॉ एल एन वैष्णव)
दमोह,24 feb/ पटेरा विकासखंड के ग्राम रेवझांकला में कंपाउंड वाल निर्माण को लेकर सामने आया मामला अब गंभीर वित्तीय अनियमितता से आगे बढ़कर प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा सवाल बन गया है। जिस निर्माण कार्य को 2024 में गठित जांच समिति ने नियमविरुद्ध बताते हुए निरस्त कर दिया था और 0.93 लाख रुपये की वसूली के आदेश दिए थे, उसी कार्य के नाम पर 08 फरवरी 2026 को लगभग 7 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया।दो वर्ष बाद हुआ यह भुगतान कई परतों में सवाल खड़े कर रहा है।
जांच रिपोर्ट क्या कहती थी?
ग्रामीणों की शिकायत पर तत्कालीन जिला पंचायत स्तर से गठित जांच दल ने स्पष्ट पाया था कि—
- निर्माण तकनीकी स्वीकृति और मानकों के अनुरूप नहीं था।
- कार्य में गंभीर अनियमितताएं थीं।
- सरपंच द्वारा राशि के दुरुपयोग के तथ्य प्रमाणित हुए।
जांच समिति ने निर्माण को निरस्त घोषित करते हुए संबंधित राशि की वसूली के निर्देश जारी किए थे।
इसके बावजूद उसी कार्य से संबंधित मद में बाद में पूरा भुगतान होना व्यवस्था पर सीधा प्रश्नचिन्ह है।
भुगतान की प्रक्रिया पर गंभीर संदेह
सबसे अहम सवाल यह है कि—
- निरस्त कार्य की एंट्री दोबारा कैसे सक्रिय हुई?
- क्या तकनीकी सत्यापन हुआ था?
- भुगतान आदेश किस स्तर से स्वीकृत हुआ?
यह महज लापरवाही है या फिर सुनियोजित तरीके से फाइलों को आगे बढ़ाया गया? यदि जांच रिपोर्ट प्रभावी थी तो भुगतान रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी?
किन पर उठ रही उंगली?
मामले में—
- पूर्व उपयंत्री,
- वर्तमान एफटीओ प्रमोद सक्सेना,
- जनपद पंचायत सीईओ हलधर मिश्रा
की भूमिका चर्चा में है।
प्रमोद सक्सेना से जब मोबाइल पर पक्ष जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने बात सुनते ही कॉल समाप्त कर दिया। वहीं सीईओ हलधर मिश्रा कार्यालय में उपलब्ध नहीं मिले। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि सरपंच, सचिव और कुछ अधिकारियों की मिलीभगत के बिना ऐसा भुगतान संभव नहीं।
विभागीय साख पर असर
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, जिसकी कमान ईमानदार मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल पास है, हमेशा पारदर्शिता की बात करता रहा है। ऐसे में यह मामला विभागीय तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है।
अब सबकी निगाहें दमोह कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर पर टिकी हैं—
- क्या निरस्त कार्य के भुगतान की राशि की वसूली होगी?
- क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर निलंबन या विभागीय जांच के आदेश होंगे?
- क्या पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाएगी?
जनता का सवाल: गलती या घोटाला?
जांच समिति की स्पष्ट आपत्ति के बाद भी भुगतान होना साधारण प्रशासनिक भूल नहीं माना जा सकता। यह वित्तीय अनुशासन और निगरानी तंत्र की कमजोरी को उजागर करता है। ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए, अन्यथा यह उदाहरण भविष्य में पंचायत स्तर पर अनियमितताओं को बढ़ावा देगा।मामला अब केवल रेवझांकला तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे जिले में चर्चा का विषय बन चुका है।
