इंदौर | 28 फरवरी /आगामी होली पर्व को लेकर तिथि, भद्रा एवं चंद्रग्रहण की स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष होलिका दहन की तिथि को लेकर ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र में विशेष विचार किया गया है। आचार्य पं. नारायण वैष्णव ने शास्त्रीय आधार पर स्पष्ट किया है कि वर्ष 2026 में होलिका दहन 2 मार्च 2026, फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी (पूर्णिमा व्याप्ति सहित) के दिन प्रदोष काल में करना ही शास्त्रसम्मत रहेगा।
तिथि एवं ग्रहण का विशेष विचार
आचार्य के अनुसार 2 मार्च 2026 को प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी तथा संपूर्ण रात्रि में भद्रा का प्रभाव रहेगा। यद्यपि 3 मार्च को भी पूर्णिमा का अंश उपलब्ध है, किंतु उस दिन ग्रस्तोदय चंद्रग्रहण होने के कारण स्थिति भिन्न हो जाती है।उन्होंने बताया कि 3 मार्च को ग्रहण काल तथा प्रदोष से पूर्व ही पूर्णिमा समाप्त हो रही है। ऐसी स्थिति में धर्मशास्त्रों, विशेषतः धर्मसिंधु में वर्णित ग्रहण विचार के अनुसार, यदि दूसरे दिन ग्रस्तोदय ग्रहण हो और प्रदोष काल में पूर्णिमा न रहे तो होलिका दहन पूर्व दिवस में ही किया जाना चाहिए।
धर्मसिंधु के वचनानुसार –
“ग्रस्तोदय परदिने प्रदोषे पूर्णिमासत्वे ग्रहणमध्य एव कार्यम्, अन्यथा पूर्वदिने।”
अर्थात् यदि ग्रहण के कारण प्रदोष में पूर्णिमा उपलब्ध न हो तो पूर्व दिन ही होलिका दहन करना उचित है।
भद्रा का विचार
2 मार्च को भद्रा सायं 5:56 बजे से प्रारंभ होकर 3 मार्च प्रातः 5:29 बजे तक रहेगी। शास्त्रों में उल्लेख है कि यदि भद्रा निशीथ काल (मध्यरात्रि) के बाद तक रहे तो प्रदोष काल में भद्रा के मुख का त्याग कर दहन किया जा सकता है।अतः शास्त्रसम्मत समयानुसार 2 मार्च 2026 को सायं 6:28 से रात्रि 8:52 बजे तक प्रदोष वेला में होलिका दहन करना उचित रहेगा।
शास्त्रसम्मत निर्णय
यद्यपि पूर्णिमा की व्याप्ति साढ़े तीन प्रहर से अधिक है और प्रतिपदा वृद्धिगामी है, तथापि ग्रहण विचार को प्रधानता देते हुए होलिका दहन 2 मार्च को ही करना उचित बताया गया है।
आचार्य पं. नारायण वैष्णव (503 सुदामानगर, महावीर गेट, सेक्टर-ए, इंदौर 83910-29304 &99267-48588 ) ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया है कि वे शास्त्रीय नियमों का पालन करते हुए प्रदोष काल में विधि-विधान से पूजन एवं दहन करें।
